दिल्ली के तहजीब्दार लोग
"दिल्ली दिलवालों की नगरी है"|ये पंक्तियाँ शत प्रतिशत सही हैं|कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है जिस से आप सभी अवगत होंगे|सरकार द्वारा दिल खोल कर पैसा बहाया जाना इस बात का सबूत है की दिल्ली दिलवालों की है,अब काम किसी भी कारण से पूरा न हो सके तो इसके लिए बेचारी सरकार क्या करे | कभी लखनऊ के बाद तहजीब में दिल्ली का ही नम्बर आता था लेकिन अब गिरेबान में झांकें तो लगता है की सारा सलीका भूल गए हैं|फुटपाथ पर न चल के सड़क पर चलना हमारी आदतों में शुमार है,अगर मुंबई जाकर सड़क पर चलते हैं तो कांस्टेबल पूछ ही लेता है की आप दिल्ली से हैं क्या?
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगाते हैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लगना हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की घटनाएँ सबसे ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव पसार रही हैं| सफाई की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई सानी नही है|घर से बाहर कूड़ा ऐसे फ़ेंक देते हैं मानो ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो|दुकानवाले दुकान को भी अपनी दुकान का ही हिस्सा मानते हैं,भले ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी घिन न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
विदेशियों के साथ हुई घटनाएँ और बुरा बर्ताव हमारी संस्कृति को दिखाता है|ऑटो वाले उन्हें अपने ऑटो में ज़बरदस्ती बैठाने लगते हैं तो कई लोग उनके साथ बड़ी ही बुरी तरह से पेश आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी आमिर खान का सहारा लेकर विज्ञापन करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि देवो भव: के नारे लगाने की|बिजली की फिजूलखर्ची या पानी की बर्बादी भी हमें दिल्ली वाला साबित करती है|लेकिन अगर कोई कुछ कह दे तो भाई लोग ऐसा हंगामा करते हैं जैसे किसी ने झूठा आरोप मढ़ दिया हो|सिस्टम की खामियां जीवन को मुश्किल बनाती हैं पर क्या हमने अपनी लापरवाही से उन्हें और नही बढ़ा दिया है|हम हर बुरे के लिए सरकार को दोष देते हैं परन्तु क्या हमें अपने गिरेबान में नही झांकना चाहिए?हमें भी तो एक आदर्श स्थापित करने की ज़रूरत है|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
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