सोमवार, 28 सितंबर 2009

दिल्ली के tehzibdaar लोग

"दिल्ली दिलवालों की नगरी है"|ये पंक्तियाँ शत प्रतिशत सही हैं|कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है जिस से आप सभी अवगत होंगे|सरकार द्वारा दिल खोल कर पैसा बहाया जाना इस बात का सबूत है की दिल्ली दिलवालों की है,अब काम किसी भी कारण से पूरा न हो सके तो इसके लिए बेचारी सरकार क्या kare| कभी लखनऊ के बाद तहजीब में दिल्ली का ही नम्बर आता था लेकिन अब गिरेबान में झांकें तो लगता है की सारा सलीका भूल गए हैं|फुटपाथ पर न चलके सड़क पर चलना हमारी आदतों में शुमार है,अगर मुंबई जाकर सड़क पर चलते हैं तो कांस्टेबल पूछ ही लेता है की आप दिल्ली से हैं क्या?
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगातेहैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली
बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लग्न हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की ghatatnaye सबसे
ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव pasaar रही हैं|safayi की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई saani नही है|घर से बाहर kooda ऐसे phek देते हैं mano ये हमारा janmsiddh अधिकार हो|dukaanwale dukan को भी अपनी dukan का ही hissa mante हैं,bhale ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी ghinn न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
videshiyon के साथ हुई ghatnayen और बुरा bartaav हमारी sanskruti को dikhata है|auto वाले unhe अपने auto में zabardasti baithaane लगते हैं तो कई लोग unhe बड़ी ही buri तरह से pesh आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी aamir khan का sahara लेकर vigyapan करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि devo bhav के nare लगाने की|बिजली की fizoolkharchi या pani की barbadi भी hame दिल्ली wala sabit करती है|lekin अगर कोई कुछ keh दे तो भाई लोग ऐसा hungama करते हैं जैसे किसी ने झूठा aarop madh दिया हो|system की khamiyan जीवन को mushqil बनाती हैं पर क्या हमने अपनी laparwahi से unhe और नही बढ़ा दिया है|हम हर burai के लिए सरकार को dosh देते हैं परन्तु क्या hame अपने गिरेबान में नही jhaankna चाहिए?hame भी तो एक aadarsh sthapit करने की ज़रूरत है|

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