नेताओं की सुरक्षा,जनता का सरदर्द
यह बात जगजाहिर है कि नेताओं के लिए होने वाले सुरक्षा इंतजामों के कारण जनता को काफी दिक्कतें पेश आती हैं|इसके अनेकों प्रसंग देखे गए हैं|इस बार यह मसला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चंडीगढ़ पीजीआई दौरे के कारण चर्चा में आया है|पीजीआई के अन्दर जिस वक़्त वह चिकित्सकों और कर्मचारियों को मरीजों की सेवा करने की नसीहतें दे रहे थे,उसी वक़्त बाहर गेट पर एक व्यक्ति इलाज के बगैर ज़िन्दगी और मौत से जूझ रहा था|उसे कभी इस गेट पर तो कभी उस गेट पर चक्कर कटाए जा रहे थे|आखिरकार उसने तड़पते हुए दम तोड़ दिया|उसकी मौत शायद न होती अगर उसे एक गेट से दूसरे गेट तक चक्कर न काटने पड़ते|इस घटना से उत्तेजित मृतक के परिजनों ने काफी हंगामा किया|बाद में इसकी शिकायत पुलिस में भी दर्ज करायी गयी|बाद में प्रधानमंत्री को उस परिवार से माफ़ी भी मंगनी पड़ी थी और पीएमओ ने भी खेद जताया था|दरअसल सुमित प्रकाश को अगर समय से उपचार मिल जाता तो उसे ओक्सिजन मिल गयी होती तो उसकी जान बचाई जा सकती थी|
असल में यह कोई पहला मामला नहीं है|इस से पहले भी आम आदमी के नेताओं और अति विशिष्टों की सुरक्षा की भेंट चढ़ने के किस्से होते रहे हैं|हर बार इस मसले पर बहस भी होती रही है,परन्तु आज तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया|आम आदमी भी इन "ख़ास" लोगों के कारण कई बार मुश्किल में आ चुका है|इसके पहले 1998 में इन्दर कुमार गुजराल के काफिले में एक व्यक्ति के दाखिल हो जाने पर दिल्ली पुलिस के जवानों ने जमकर उसकी पिटाई की थी|वो व्यक्ति एक कंपनी में काम करता था|इसी प्रकार 1991 में एक व्यक्ति नवदीप दीवान को पुलिसवालों ने बुरी तरह महज़ इसलिए पीट दिया क्योंकि वह गलती से प्रधानमंत्री के लिए लगे रूट में घुस गया था|२ अक्टूबर 1993 में भी कई गांधीवादियों को भी इसलिए पीटा गया क्योंकि वह पीएम रूट में प्रवेश करते हुए राजघाट जा रहे थे|
सवाल ये उठता है की क्या इन लोगों के आगे मानवता का कोई मोल नहीं?एक तरफ तो इन लोगों की जानें इतनी कीमती,वहीं आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं?उनका खून खून ,आम आदमी का खून पानी?अगर नहीं तो फिर ये भेदभाव क्यूँ?आम आदमियों को इस से इंकार नहीं कि नेताओं को सुरक्षा मिले,बस उन्हें यह परेशानी है कि ये सुरक्षा आम आदमी की जान के बदले कतई नहीं|आडवाणी के रूट के कारण एक विद्यार्थी परीक्षा में नहीं पहुँच सका था|इसके बाद वे दिल्ली के आसपास जाने के लिए हेलीकाप्टर का इस्तेमाल करने लगे थे|हालांकि ये माध्यम खर्चीला ज़रूर है परन्तु इस से किसी को कोई परेशानी तो नहीं होगी|
इस बात से कोई इंकार नहीं कर पायेगा कि सुरक्षा के नाम पर ट्रैफिक रोकने ,अस्पतालों को ताला लगाने,बेवजह तलाशी लेने के नाम पर पुलिस आये दिन आम जनता को परेशान करती है|अगर उन्हें आम आदमी कि मुश्किलें नहीं दिखाई देती तो वे किस काम के लिए हैं?उनका सबसे पहला फ़र्ज़ जनता के लिए काम करना है |नेता भी उसके बाद आते हैं|इस बारे में उन "खास"लोगों को सोचना होगा जिन्हें आम लोगों ने ही ख़ास बनाया है|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|