मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

धर्म का सहारा

धर्म का सहारा
धार्मिक होना कोई जुर्म नहीं और नाही इसमें कुछ गलत है|धर्म सन्मार्ग पर चलने का,दृढ निश्चय का और यथार्थवादी होने का पर्याय है|दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ इतने धर्म हैं|यहाँ पर इतने धर्मों के बावजूद लोग सौहार्द और प्रेम से रहते हैं,हालांकि ये बात और है कि कई दंगे भी धर्म के नाम पर ही हुए हैं|राजनेता हों या अपने हित साधने वाले प्राणी,सब ही धर्म को अपना औजार बनाते हैं|इस औजार कि धार ही कुछ ऐसी है कि छूते ही काम समाप्त|धर्म के नाम पर आडम्बरों की भी कमी यहाँ नहीं है|कई लोगों के शुद्ध मुनाफे का जरिया भी धर्म है|इसी के सहारे कई लोग अपनी दुकान चलते हैं|

कष्ट की बात तो तब होती है जब लोग धर्म के नाम पर वस्तुएं हथियाने पर आ जाते हैं|जगहों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है और उसे अपने धनोपार्जन का पर्याय बना लिया जाता है|उदहारण के लिए शुरू में जहाँ पीपल का पेड़ होता है उसके आस पास दिये जलने शुरू होते हैं,फिर देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं और इसके बाद वहां एक छोटा मंदिर खड़ा हो जाता है|इस प्रक्रिया के परवान चढ़ते चढ़ते एक दिन ऐसा आता है की वहां पर एक बड़ा मंदिर खड़ा हो जाता है जिस पर लिख दिया जाता है"प्राचीन पीपल महादेव मंदिर" या फिर प्राचीन महादेव मंदिर या फिर कुछ और नाम|इसके बाद पुजारी जी उसमे निवास करने लगते हैं जिस से उनके इतने बड़े शहर में निवास की समस्या समाप्त हो जाती है|ये निवास डी.डी.ए की तरह एकदम स्थायी होता है जिसे कोई माई का लाल हाथ नहीं लगा सकता|अगर कोई हाथ लगाएगा तो धर्म रुपी ब्रह्मास्त्र है न...
बात यहाँ किसी एक धर्म की नहीं है बल्कि कमोबेश हर एक का यही हाल है|रोड के किनारे इन्हें बनाने का तो चलन सा है|रोड चौड़ा होने का कोई चांस नहीं|रोड चौड़ा होगा तो वो मंदिर अथवा मस्जिद गिराया जाएगा परन्तु बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?अगर वो इमारत गरई जायेगी तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी|इसे मुद्दा बन जाने में तनिक भी विलंब नहीं होगा|

राजनीति एक दो-धारी तलवार है |पहले ये इन इमारतों के बन ने पर कोई विरोध नहीं जताती पर जब ये बन चुके होते हैं और इन्हें गिराया जाना ज़रूरी हो जाता है तब इनकी कुम्भकर्णी निद्रा टूटती है|अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में इस बात को कहा है की रोड के किनारे धार्मिक इमारतों का निर्माण न करें|हमें इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है की हमें धार्मिक स्थलों को अपना और दूसरो का सरदर्द बन ने से बचें|इसके लिए सरकार लोगों को शिक्षित करे,युक्तिसंगत क़ानून बनाए तथा अपनी आँखें और कान खुले रखे|

अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|

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