गुरुवार, 5 नवंबर 2009

करोड़ों के कोड़ा

मधु कोड़ा को आप जानते ही होंगे|झारखण्ड का वो चेहरा जो 2006 में मुख्यमंत्री बना|उस समय सबको आश्चर्य हुआ था की एक निर्दलीय मुख्यमंत्री बन गया|लोगों को लगा था के किसी पार्टी विशेष का न होने के कारण ये व्यक्ति राजनीति में न उलझ,घोटाले ना कर प्रदेश को आगे ले जाएगा|लेकिन हाय री फूटी किस्मत,क्या सोचा था और क्या हो गया|हालांकि ये कांग्रेस के समर्थन के बिना मुमकिन नहीं था|ये बात और है की आज कांग्रेस अपना पल्ला झाड़ती नज़र आ रही है|
एक कहावत है-लड़े फौज,नाम सरदार का
काटे धार,नाम तलवार का|
कांग्रेस जब श्रेय लेने में आगे रहती है तो यहाँ बदनामी से वो क्यों पीछे हट रही है?जब महाराष्ट्र में उसका गठबंधन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ है,और ये दोनों पार्टियाँ कोई भी श्रेय लेने में पीछे नहीं हट ती तो फिर यहाँ अपवाद क्यों ?इस सरकार को कांग्रेस का ही तो समर्थन हासिल था वर्ना क्या मजाल एक निर्दलीय मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी पर काबिज़ हो जाता?ऐसे कैसे संभव है की मुख्यमंत्री विदेशों में निवेश करते रहे और कांग्रेस को कोई जानकारी नहीं थी?
मधु कोड़ा मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं|अब तक की छापेमारी में कोड़ा और सहयोगियों द्वारा बैंकॉक,दुबई,मलयेशिया,लाओस,इंडोनेशिया,सिंगापुर में सैकड़ों करोड़ के निवेश सम्बन्धी दस्तावेज़ आयकर के हाथ लगे हैं|मुंबई में सोमवार को तलाशी अभियान में शेयर ब्रोकिंग कंपनी नटराज फिनान्शिअल एंड सर्विसेस के कोड़ा एंड कंपनी द्वारा अधिग्रहण करने सम्बन्धी मामले का खुलासा हुआ|मुंबई में बालाजी ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज़ के अलावा भी कुछ स्थानों पर तलाशी का काम पूरे दिन चलता रहा|
दरअसल संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के नाम पर निवेश किये गए अरबों असल में मधु कोड़ा के ही हैं|छापे के दौरान मिले सबूतों से इसकी पुष्टि भी होती है|इन दोनों ने अधिकांश संपत्तियां मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में बनाईं|इसके अलावा हवाला के ज़रिये विदेश में 400 करोड़ से ज्यादा के घोटाले का भी खुलासा हुआ है|कुल मिलकर यदि कहें तो अंदेशा है की ये घोटाला
2000
करोड़ से ऊपर का है|इस बाबत मधु कोड़ा पर यदि आरोप साबित हो जाते हैं तो मनी लांड्रिंग एक्ट के साथ साथ विदेशी मुद्रा प्रबंधन क़ानून के तहत कारवाही हो सकती है|

इसं सभी के बीच कोड़ा रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गए हैं|अब क्या ये संयोग है कि उन्हें अस्पताल में भी अभी भर्ती होना था?क्या अभी ही उनकी तबियत ख़राब होनी थी?पर ये बात तो है की हमारे देश में लोग भूख से,सूखे से,बाढ़ से महंगाई से बेशक मर रहे हों पर नेताओं को इसकी क्या परवाह|महंगाई ने आम आदमी की दो जून की रोटी तक छीन ली है पर ये सफ़ेदपोश नेता अपनी तिजोरियों को बहरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरत रहे|जनता का पैसा उनके लिए खर्च न कर अपनी एय्याशियों पर लुटाना तो कोई इनसे सीखे|आज लोग शायद यही सोचते होंगे की क्या मिला देश को आज़ाद करवा कर?क्यूँ लोग शहीद हुए?क्यों स्वतंत्रता सेनानियों ने लाठियां खायीं?इस से अच्छा तो अंग्रेजों का राज था|उन्हें भी क्या मालूम था की एक दिन अपनी आस्तीन के सांप ही हमें डस लेंगे|ऐसे किस्से सुनकर शायद ही कोई नेताओं के प्रति संवेदना रखे या उन्हें इज्ज़त दे|पर सवाल ये भी है की जनता करे तो क्या करे?लंका में सभी 52 गज के हैं|आखिर चुने तो किसे चुने?लेकिन अगर इसका कुछ हल न निकाला गया तो देश का मलियामेट किसी बाहरी ताक़त से पहले ये नेता ही कर डालेंगे|

अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|

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