अब मेट्रो की बारी
महंगाई ने दिल्लीवासियों का जीना मुहाल किया हुआ है|डीटीसी ने जो ज़ख्म दिया था ,मेट्रो ने उसे नासूर बना दिया है|दिल्ली की जनता स्तब्ध है की आखिर ये हो क्या रहा है|रामायण में भी योध्धाओं को विरोधी के तीरों से बचने का मौका मिल ही जाता था पर शीला दीक्षित तो जनता को उबरने तक का मौका नहीं दे रही|पहले से ही जनता महंगाई की मारी हुई है तो रही सही कसर मेट्रो के किराए वृद्धि ने पूरी कर दी है|मेट्रो के किराए में 33 फीसदी तक की वृद्धि का फैसला लिया गया है|डी.एम.आर .सी मुख्यालय में मेट्रो की नयी किराया दरों के घोषणा करते हुए निदेशक (वित्त) आर.एन जोशी ने बताया कि नयी दरें 13 नवम्बर से लागू हो जाएँगी|नए चार्ट के अनुसार न्यूनतम किराया 6 से बढाकर 8 रु कर दिया गया है|जोशी ने कहा कि डी.एम.आर.सी ने परिचालन एवं अनुरक्षण में बढ़ रही लागत कि वजह से किराया वृद्धि की है|जोशी के मुताबिक मेट्रो की शुरुआत में न्यूनतम किराया ४ रु था|पहली बार 31 दिसम्बर 2005 में मेट्रो ने किराया वृद्धि की तथा न्यूनतम किराया ४ से ६ रु कर दिया|पिछले २ साल से मेट्रो फिर से किराया बढ़ाने का प्रयास कर रही थी लेकिन सरकार से हरी झंडी नहीं मिल रही थी|मेट्रो ने यात्री टोकन की तुलना में स्मार्ट कार्ड पर दी जाने वाली 10 प्रतिशत छूट को जारी रखने का फैसला किया है|एक दिन के यात्री कार्ड की कीमत 70 से बढाकर 100 रु तथा तीन दिन की वैधता वाले कार्ड की कीमत 200 से बढाकर 250 रु की गयी है|किराए के लिए गठित की जाने वाली कमिटी ने कहा है की यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं व् आराम को ध्यान में रखते हुए वृद्धि सही है|
कुल मिलाकर यदि देखें तो हम यही पाएंगे की किसी न किसी बहाने सरकार गरीबों की कमर तोड़ने में लगी है|आम आदमी से हर चीज़ परे होती जा रही हैं|गरीबों को दिल्ली को पेरिस बनाने की कीमत बहुत ज्यादा चुकानी पड़ रही है|लोग कहते हैं कि "कांग्रेस का नारा गरीबी हटाओ की जगह गरीब भगाओ "मालूम देता है|यही आलम रहा तो वो दिन दूर नहीं जब लोग दाने दाने को मोहताज हो जायेंगे जैसा कि पेरिस में नहीं होता|तुलना भी अपनी औकात में रहकर करनी चाहिए|क्या फ्रांस में घोटाले सुने हैं?क्या वहां भी कई कोड़ा हैं?क्या वहां हवाला घोटाला,चारा घोटाले होते हैं?क्या वहां लोग जहाँ मन चाहे थूक देते हैं या पेशाब कर देते हैं?क्या वहां की सरकारें जनता से पूछे बिना कोई भी फैसला उनपर लाद देती हैं?स्विट्जरलैंड में पहले नेता जनता से पूछते हैं फिर कोई कानून बनाते हैं|सरकार को ये सोचना होगा की खुद को भी इस काबिल बनाए कि तुलना यथार्थवादी लगे और जनता में उसकी और नेताओं की छवि अच्छी हो न की घोटालेबाजों वाली|
अरुण सरोहा
हिन्दी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
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