शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

डीटीसी का खेल

डीटीसी का खेल
महंगाई कि मार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही है पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही|लोग ये सोच रहे हैं कि वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब हम कांग्रेस को वोट देकर आये थे|सारे मीडिया में और लोगों के बीच सरकार कि थू-थू हो रही है|लोग ये कह रहे हैं कि ऐसे कौन से लोग डीटीसी के किराये बढ़ाने के पीछे हैं जिन्होंने किराया बढ़ाते वक़्त बिलकुल दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया|ऐसा नहीं कि शीला दीक्षित या अन्य नेता टेलिविज़न न देखते हों या अखबार न पढ़ते हों पर अगर बेशर्मी न हो तो नेता कौन कहे?
दरअसल किराए की स्टेज में भरी गड़बड़झाला है| इसमें काफी खामियां हैं|किलोमीटर के हिसाब से स्टेज कैरेज नहीं बनाया गया है,बल्कि हर स्टाप को ही किलोमीटर मान लिया गया है और उसी के हिसाब से किराया निर्धारित किया गया है|उदहारण के लिए,तीन स्टापों को तीन किलोमीटर मान लिया गया है और उसका किराया ५ रु कर दिया गया है,फिर चे तीन स्टाप १ से १.५ किलोमीटर के बीच ही क्यों न हों|कई जगह तो १ किलोमीटर के दूरी के बीच दो स्टेज पड़ रहे हैं यानि यात्री ३ किमी कि दूरी तय नहीं कर रहे लेकिन उन्हें १० रु देने पड़ रहे हैं|साथ साथ ये भी बता दें कि जितने भी "बाई रिक्वेस्ट " स्टाप बनाए गए थे उन्हें अब फेयर स्टेज में बदल दिया गया है|पहले इन स्टाप्स पर गाड़ी रूकती थी,जिसका किराया पिछले स्टाप से जोड़ा जाता था|
मताब यदि आप दिल्ली गेट से सुप्रीम कोर्ट जाएँ तो पहले किराया था ३ रु और ये एक ही स्टेज मन जाता था|जबकि दोनों जगहों के बीच एक्सप्रेस बिल्डिंग ,आई टी ओ एवं तिलक मार्ग तीन "बाई रिक्वेस्ट "स्टाप भी हैं|अब इसका किराया १० रु हो गया है,जबकि वास्तव में ये दूरी १ से १.५ किलोमीटर ही है|लगभग दिल्ली के हर इलाके में ऐसी ही समस्या आ रही है जिस से यात्रियों और कंडक्टर में बहस हो रही है|

जब लोगों का कड़ा विरोध सामने आया तो अब सरकार नाक बचाने के चक्कर में मीटिंग करती नज़र आ रही है|कल डीटीसी प्रबंधन कि मीटिंग दिन भर चलती रही|डीटीसी के कई अधिकारी और कंडक्टर दबी ज़बान में स्वयं ये मानते हैं स्टाप्स को किलोमीटर में बदलना भरी गलती है और इतना ज्यादा किराया तो किसी हाल में तर्कसंगत नहीं लगता|

आलम अब ये है कि यात्री डीटीसी बसों में काफी कम दिख रहे हैं|जब ५ रु कि जगह यात्री को सीधे दोगुना यानि १० रु किराया देना पड़ रहा है तो उसकी व्यथा बाहर आ ही जाती है|सरकार अगर अब भी जाग जाये तो भी सवेरा कहिए वर्ना अगर जनता अपनी पर आ गयी तो बड़े बड़े तख्त भी पलट देती है|

अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|

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