शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

आरक्षण एक लोलीपॉप
आरक्षण से तो आप सभी अवगत होंगे|वैसे कहने को तो भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है परन्तु वास्तविकता कुछ और ही है|इतिहास गवाह है की धर्म और जाति के नाम पर मीठी -मीठी बातें भी हुईं और धर्म-जाति के ही नाम पर लोगों को मारा काटा भी गया|राजनीतिक रोटियां अगर सेंकनी हों तो धर्म-जाति से बढ़िया तवा आपको संसार में नहीं मिलेगा|कुछ लोग ये नहीं चाहते की देश में अमन चैन रहे|इसलिए ये चंद लोग आये दिन धर्म या जाति को अपना औज़ार बनाते हैं|एक तरफ तो सरकार धर्मनिरपेक्षता की बात करती है,सबको समान अधिकारों की बात करती है परन्तु दूसरी तरफ जाति के ही नाम पर आरक्षण देती है ताकि ये जाति व्यवस्था कायम रहे और वो इसे लोलीपॉप की तरह कभी इसके हाथ में तो कभी उसके हाथ में देती रहे|माना के दबेकुच्ले हुए लोगों को आगे लाना कोई बुरी बात नहीं परन्तु क्या इसकी कीमत सामान्य जाति के लोगों को इतनी ज्यादा चुकानी पड़े की उनका जीना तक मुहाल हो जाए,क्या ये न्यायसंगत है?
दिल्ली जैसे बड़े शहर में कहाँ कौन पिछड़ा हुआ है?वैसे बाबा साहेब अम्बेडकर ने संविधान में दलितों को आरक्षण इसलिए दिया था ताकि वे दुसरे वर्गों एवं जातियों के बराबर आ सकें|यह 10 साल के लिए किया गया था|लेकिन दुर्भाग्य ये की वो 10 साल आज तक ख़त्म नहीं हुए|ख़ुद अम्बेडकर ने यह नहीं सोचा होगा की ये आरक्षण कभी ख़त्म नहीं होगा|उन्हें क्या मालूम था की ये "घाघ"इससे ज़िन्दगी भर अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे|इसे नेताओं ने राजनीति करने का साधन बना लिया|कभी अन्य पिछड़े वर्गों को आरक्षण,कभी महिलाओं को तो कभी मुसलमानों को|जबकि आरक्षण 50 फीसद से ज्यादा नहीं हो सकता परन्तु कई राज्यों में ये 50 फीसदी की सीमा पार कर चुका है|मैं पूछता हूँ की आरक्षण आर्थिक आधार पर क्यों न दिया जाए?गरीब किसी भी जाति का वर्ण का व्यक्ति हो सकता है तो क्या सवर्ण गरीब परिवार में पैदा होना उसकी गलती है?एक व्यक्ति तो पुश्त दर पुश्त आरक्षण की मलाई काटता आ रहा है और दूसरा बेचारा दर दर की ठोकरें|जहाँ आरक्षण का वास्तव में लाभ देने की ज़रुरत है जैसे छत्तीसगढ़,त्रिपुरा,नागालैंड इत्यादि की जनजातियाँ वहां तो ये पहुच नहीं पा रहा और दिल्ली जैसे शहर में लोग खूब इसका लाभ उठा रहे हैं|उदाहरण के लिए दिल्ली में धन धनाड्य परिवारों से ताल्लुक रखने वाले लोग भी आरक्षण की मलाई काट रहे हैं|बाप के बाद बेटा,बेटे के बाद उसका बेटा,यह क्रम इसी प्रकार चलता रहता है|यदि किसी परिवार से एक व्यक्ति ब्यूरोक्रेट बन जाता है तो कई पुश्तें सुधर जाती हैं परन्तु फिर भी उसका बेटा इसका लाभ लेगाऔर फिर उसका भी बेटा|मीना जाति ने इसीलिए हंगामा किया था की गुज्जरों ने उनकी श्रेणी में से आरक्षण के लिए दावा पेश कर दिया था,अब जो इतने सालों से इसकी मलाई खाते आ रहे हों वे भला इसका विरोध क्यों न करते?उदाहरण के लिए दो व्यक्तियों को लीजिये-एक प्रशानिक अधिकारी है जो अनुसूचित जाति से है वहीं दूसरा व्यक्ति एक क्लर्क है जो सामान्य श्रेणी में है|दोनों के बच्चे जब कहीं आवेदन करते हैं तो प्रशासनिक अधिकारी के बेटे को फीस या तो नहीं देनी होती या बिलकुल मामूली जबकि उसका पिता पूरी तरह सक्षम है,वहीं जिस क्लर्क की आय दुसरे के मुकाबले आधी भी नहीं उसके बेटे को पूरी फीस देनी पड़ेगी|ये कैसा न्याय है?आरक्षण यहीं नहीं ठहरता बल्कि फीस माफ़ी के बाद आरक्षित सीटों से लेकर ऊम्र में छूट,फिर नौकरी पाने के बाद पदोन्नति में भी अपना रंग दिखाता है|यानि वह व्यक्ति मरते दम तक आरक्षण का लाभ लेकर मरता है|

अगर सीटों के आरक्षित होने की बात करें तो वह व्यक्ति अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर तो दावा कर ही कर सकता है बल्कि सामान्य पर भी दावा ठोंक सकता है|अगर उसके सामान्य वर्ग के कट-ऑफ के बराबर अंक आ गए तब वह सामान्य वर्ग में आ जाएगा और सामान्य वर्ग की एक सीट हथिया लेगा जबकि जो अभ्यर्थी सामान्य वर्ग का है वह किसी और सीट पर अपना दावा पेश नहीं कर सकता,इस से भी सामान्य वर्ग की पतली हालत का अनुमान लगाया जा सकता है|तभी तो यह मांग भी उठ रही है की जैसे सीटें अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए आरक्षित हैं उसी तरह सामान्य वर्ग के लिए जो सीटें हैं वो भी सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित कर दी जाएँ ताकि सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए कुछ तो राहत हो|

दूसरा,जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए"क्रीमी लेयर" का प्रावधान है उसी तरह अनुसूचित जाति या जनजाति के लिए भी यह रूल बने|क्यों वे एक के बाद एक इसका लाभ उठायें|अनुसूचित जाति के एक राजपत्रित अधिकारी का बेटा क्यों क्रीमी लेयर में न आये जबकि उसपर वो सारे मापदंड खरे उतारते हैं जो उसे क्रीमी लेयर में आने देने के लिए पर्याप्त हैं|अगर सामान्य वर्गों के साथ इसी तरह बर्ताव होता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब सामान्य और गरीब परिवार में पैदा हुए बच्चे पर ख़ुशी नहीं मातम मनाया जाएगा|

अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|

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