अब मेट्रो की बारी
महंगाई ने दिल्लीवासियों का जीना मुहाल किया हुआ है|डीटीसी ने जो ज़ख्म दिया था ,मेट्रो ने उसे नासूर बना दिया है|दिल्ली की जनता स्तब्ध है की आखिर ये हो क्या रहा है|रामायण में भी योध्धाओं को विरोधी के तीरों से बचने का मौका मिल ही जाता था पर शीला दीक्षित तो जनता को उबरने तक का मौका नहीं दे रही|पहले से ही जनता महंगाई की मारी हुई है तो रही सही कसर मेट्रो के किराए वृद्धि ने पूरी कर दी है|मेट्रो के किराए में 33 फीसदी तक की वृद्धि का फैसला लिया गया है|डी.एम.आर .सी मुख्यालय में मेट्रो की नयी किराया दरों के घोषणा करते हुए निदेशक (वित्त) आर.एन जोशी ने बताया कि नयी दरें 13 नवम्बर से लागू हो जाएँगी|नए चार्ट के अनुसार न्यूनतम किराया 6 से बढाकर 8 रु कर दिया गया है|जोशी ने कहा कि डी.एम.आर.सी ने परिचालन एवं अनुरक्षण में बढ़ रही लागत कि वजह से किराया वृद्धि की है|जोशी के मुताबिक मेट्रो की शुरुआत में न्यूनतम किराया ४ रु था|पहली बार 31 दिसम्बर 2005 में मेट्रो ने किराया वृद्धि की तथा न्यूनतम किराया ४ से ६ रु कर दिया|पिछले २ साल से मेट्रो फिर से किराया बढ़ाने का प्रयास कर रही थी लेकिन सरकार से हरी झंडी नहीं मिल रही थी|मेट्रो ने यात्री टोकन की तुलना में स्मार्ट कार्ड पर दी जाने वाली 10 प्रतिशत छूट को जारी रखने का फैसला किया है|एक दिन के यात्री कार्ड की कीमत 70 से बढाकर 100 रु तथा तीन दिन की वैधता वाले कार्ड की कीमत 200 से बढाकर 250 रु की गयी है|किराए के लिए गठित की जाने वाली कमिटी ने कहा है की यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं व् आराम को ध्यान में रखते हुए वृद्धि सही है|
कुल मिलाकर यदि देखें तो हम यही पाएंगे की किसी न किसी बहाने सरकार गरीबों की कमर तोड़ने में लगी है|आम आदमी से हर चीज़ परे होती जा रही हैं|गरीबों को दिल्ली को पेरिस बनाने की कीमत बहुत ज्यादा चुकानी पड़ रही है|लोग कहते हैं कि "कांग्रेस का नारा गरीबी हटाओ की जगह गरीब भगाओ "मालूम देता है|यही आलम रहा तो वो दिन दूर नहीं जब लोग दाने दाने को मोहताज हो जायेंगे जैसा कि पेरिस में नहीं होता|तुलना भी अपनी औकात में रहकर करनी चाहिए|क्या फ्रांस में घोटाले सुने हैं?क्या वहां भी कई कोड़ा हैं?क्या वहां हवाला घोटाला,चारा घोटाले होते हैं?क्या वहां लोग जहाँ मन चाहे थूक देते हैं या पेशाब कर देते हैं?क्या वहां की सरकारें जनता से पूछे बिना कोई भी फैसला उनपर लाद देती हैं?स्विट्जरलैंड में पहले नेता जनता से पूछते हैं फिर कोई कानून बनाते हैं|सरकार को ये सोचना होगा की खुद को भी इस काबिल बनाए कि तुलना यथार्थवादी लगे और जनता में उसकी और नेताओं की छवि अच्छी हो न की घोटालेबाजों वाली|
अरुण सरोहा
हिन्दी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
शुक्रवार, 13 नवंबर 2009
गुरुवार, 5 नवंबर 2009
करोड़ों के कोड़ा
मधु कोड़ा को आप जानते ही होंगे|झारखण्ड का वो चेहरा जो 2006 में मुख्यमंत्री बना|उस समय सबको आश्चर्य हुआ था की एक निर्दलीय मुख्यमंत्री बन गया|लोगों को लगा था के किसी पार्टी विशेष का न होने के कारण ये व्यक्ति राजनीति में न उलझ,घोटाले ना कर प्रदेश को आगे ले जाएगा|लेकिन हाय री फूटी किस्मत,क्या सोचा था और क्या हो गया|हालांकि ये कांग्रेस के समर्थन के बिना मुमकिन नहीं था|ये बात और है की आज कांग्रेस अपना पल्ला झाड़ती नज़र आ रही है|
एक कहावत है-लड़े फौज,नाम सरदार का
काटे धार,नाम तलवार का|
कांग्रेस जब श्रेय लेने में आगे रहती है तो यहाँ बदनामी से वो क्यों पीछे हट रही है?जब महाराष्ट्र में उसका गठबंधन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ है,और ये दोनों पार्टियाँ कोई भी श्रेय लेने में पीछे नहीं हट ती तो फिर यहाँ अपवाद क्यों ?इस सरकार को कांग्रेस का ही तो समर्थन हासिल था वर्ना क्या मजाल एक निर्दलीय मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी पर काबिज़ हो जाता?ऐसे कैसे संभव है की मुख्यमंत्री विदेशों में निवेश करते रहे और कांग्रेस को कोई जानकारी नहीं थी?
मधु कोड़ा मामले में नित नए खुलासे हो रहे हैं|अब तक की छापेमारी में कोड़ा और सहयोगियों द्वारा बैंकॉक,दुबई,मलयेशिया,लाओस,इंडोनेशिया,सिंगापुर में सैकड़ों करोड़ के निवेश सम्बन्धी दस्तावेज़ आयकर के हाथ लगे हैं|मुंबई में सोमवार को तलाशी अभियान में शेयर ब्रोकिंग कंपनी नटराज फिनान्शिअल एंड सर्विसेस के कोड़ा एंड कंपनी द्वारा अधिग्रहण करने सम्बन्धी मामले का खुलासा हुआ|मुंबई में बालाजी ग्रुप ऑफ़ कम्पनीज़ के अलावा भी कुछ स्थानों पर तलाशी का काम पूरे दिन चलता रहा|
दरअसल संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के नाम पर निवेश किये गए अरबों असल में मधु कोड़ा के ही हैं|छापे के दौरान मिले सबूतों से इसकी पुष्टि भी होती है|इन दोनों ने अधिकांश संपत्तियां मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में बनाईं|इसके अलावा हवाला के ज़रिये विदेश में 400 करोड़ से ज्यादा के घोटाले का भी खुलासा हुआ है|कुल मिलकर यदि कहें तो अंदेशा है की ये घोटाला 2000 करोड़ से ऊपर का है|इस बाबत मधु कोड़ा पर यदि आरोप साबित हो जाते हैं तो मनी लांड्रिंग एक्ट के साथ साथ विदेशी मुद्रा प्रबंधन क़ानून के तहत कारवाही हो सकती है|
इसं सभी के बीच कोड़ा रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गए हैं|अब क्या ये संयोग है कि उन्हें अस्पताल में भी अभी भर्ती होना था?क्या अभी ही उनकी तबियत ख़राब होनी थी?पर ये बात तो है की हमारे देश में लोग भूख से,सूखे से,बाढ़ से महंगाई से बेशक मर रहे हों पर नेताओं को इसकी क्या परवाह|महंगाई ने आम आदमी की दो जून की रोटी तक छीन ली है पर ये सफ़ेदपोश नेता अपनी तिजोरियों को बहरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरत रहे|जनता का पैसा उनके लिए खर्च न कर अपनी एय्याशियों पर लुटाना तो कोई इनसे सीखे|आज लोग शायद यही सोचते होंगे की क्या मिला देश को आज़ाद करवा कर?क्यूँ लोग शहीद हुए?क्यों स्वतंत्रता सेनानियों ने लाठियां खायीं?इस से अच्छा तो अंग्रेजों का राज था|उन्हें भी क्या मालूम था की एक दिन अपनी आस्तीन के सांप ही हमें डस लेंगे|ऐसे किस्से सुनकर शायद ही कोई नेताओं के प्रति संवेदना रखे या उन्हें इज्ज़त दे|पर सवाल ये भी है की जनता करे तो क्या करे?लंका में सभी 52 गज के हैं|आखिर चुने तो किसे चुने?लेकिन अगर इसका कुछ हल न निकाला गया तो देश का मलियामेट किसी बाहरी ताक़त से पहले ये नेता ही कर डालेंगे|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
एक कहावत है-लड़े फौज,नाम सरदार का
काटे धार,नाम तलवार का|
कांग्रेस जब श्रेय लेने में आगे रहती है तो यहाँ बदनामी से वो क्यों पीछे हट रही है?जब महाराष्ट्र में उसका गठबंधन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ है,और ये दोनों पार्टियाँ कोई भी श्रेय लेने में पीछे नहीं हट ती तो फिर यहाँ अपवाद क्यों ?इस सरकार को कांग्रेस का ही तो समर्थन हासिल था वर्ना क्या मजाल एक निर्दलीय मुख्यमंत्री जैसी कुर्सी पर काबिज़ हो जाता?ऐसे कैसे संभव है की मुख्यमंत्री विदेशों में निवेश करते रहे और कांग्रेस को कोई जानकारी नहीं थी?
दरअसल संजय चौधरी और विनोद सिन्हा के नाम पर निवेश किये गए अरबों असल में मधु कोड़ा के ही हैं|छापे के दौरान मिले सबूतों से इसकी पुष्टि भी होती है|इन दोनों ने अधिकांश संपत्तियां मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में बनाईं|इसके अलावा हवाला के ज़रिये विदेश में 400 करोड़ से ज्यादा के घोटाले का भी खुलासा हुआ है|कुल मिलकर यदि कहें तो अंदेशा है की ये घोटाला
इसं सभी के बीच कोड़ा रांची के एक निजी अस्पताल में भर्ती हो गए हैं|अब क्या ये संयोग है कि उन्हें अस्पताल में भी अभी भर्ती होना था?क्या अभी ही उनकी तबियत ख़राब होनी थी?पर ये बात तो है की हमारे देश में लोग भूख से,सूखे से,बाढ़ से महंगाई से बेशक मर रहे हों पर नेताओं को इसकी क्या परवाह|महंगाई ने आम आदमी की दो जून की रोटी तक छीन ली है पर ये सफ़ेदपोश नेता अपनी तिजोरियों को बहरने में ज़रा भी कोताही नहीं बरत रहे|जनता का पैसा उनके लिए खर्च न कर अपनी एय्याशियों पर लुटाना तो कोई इनसे सीखे|आज लोग शायद यही सोचते होंगे की क्या मिला देश को आज़ाद करवा कर?क्यूँ लोग शहीद हुए?क्यों स्वतंत्रता सेनानियों ने लाठियां खायीं?इस से अच्छा तो अंग्रेजों का राज था|उन्हें भी क्या मालूम था की एक दिन अपनी आस्तीन के सांप ही हमें डस लेंगे|ऐसे किस्से सुनकर शायद ही कोई नेताओं के प्रति संवेदना रखे या उन्हें इज्ज़त दे|पर सवाल ये भी है की जनता करे तो क्या करे?लंका में सभी 52 गज के हैं|आखिर चुने तो किसे चुने?लेकिन अगर इसका कुछ हल न निकाला गया तो देश का मलियामेट किसी बाहरी ताक़त से पहले ये नेता ही कर डालेंगे|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009
धर्म का सहारा
धार्मिक होना कोई जुर्म नहीं और नाही इसमें कुछ गलत है|धर्म सन्मार्ग पर चलने का,दृढ निश्चय का और यथार्थवादी होने का पर्याय है|दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ इतने धर्म हैं|यहाँ पर इतने धर्मों के बावजूद लोग सौहार्द और प्रेम से रहते हैं,हालांकि ये बात और है कि कई दंगे भी धर्म के नाम पर ही हुए हैं|राजनेता हों या अपने हित साधने वाले प्राणी,सब ही धर्म को अपना औजार बनाते हैं|इस औजार कि धार ही कुछ ऐसी है कि छूते ही काम समाप्त|धर्म के नाम पर आडम्बरों की भी कमी यहाँ नहीं है|कई लोगों के शुद्ध मुनाफे का जरिया भी धर्म है|इसी के सहारे कई लोग अपनी दुकान चलते हैं|
कष्ट की बात तो तब होती है जब लोग धर्म के नाम पर वस्तुएं हथियाने पर आ जाते हैं|जगहों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है और उसे अपने धनोपार्जन का पर्याय बना लिया जाता है|उदहारण के लिए शुरू में जहाँ पीपल का पेड़ होता है उसके आस पास दिये जलने शुरू होते हैं,फिर देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं और इसके बाद वहां एक छोटा मंदिर खड़ा हो जाता है|इस प्रक्रिया के परवान चढ़ते चढ़ते एक दिन ऐसा आता है की वहां पर एक बड़ा मंदिर खड़ा हो जाता है जिस पर लिख दिया जाता है"प्राचीन पीपल महादेव मंदिर" या फिर प्राचीन महादेव मंदिर या फिर कुछ और नाम|इसके बाद पुजारी जी उसमे निवास करने लगते हैं जिस से उनके इतने बड़े शहर में निवास की समस्या समाप्त हो जाती है|ये निवास डी.डी.ए की तरह एकदम स्थायी होता है जिसे कोई माई का लाल हाथ नहीं लगा सकता|अगर कोई हाथ लगाएगा तो धर्म रुपी ब्रह्मास्त्र है न...
बात यहाँ किसी एक धर्म की नहीं है बल्कि कमोबेश हर एक का यही हाल है|रोड के किनारे इन्हें बनाने का तो चलन सा है|रोड चौड़ा होने का कोई चांस नहीं|रोड चौड़ा होगा तो वो मंदिर अथवा मस्जिद गिराया जाएगा परन्तु बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?अगर वो इमारत गरई जायेगी तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी|इसे मुद्दा बन जाने में तनिक भी विलंब नहीं होगा|
राजनीति एक दो-धारी तलवार है |पहले ये इन इमारतों के बन ने पर कोई विरोध नहीं जताती पर जब ये बन चुके होते हैं और इन्हें गिराया जाना ज़रूरी हो जाता है तब इनकी कुम्भकर्णी निद्रा टूटती है|अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में इस बात को कहा है की रोड के किनारे धार्मिक इमारतों का निर्माण न करें|हमें इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है की हमें धार्मिक स्थलों को अपना और दूसरो का सरदर्द बन ने से बचें|इसके लिए सरकार लोगों को शिक्षित करे,युक्तिसंगत क़ानून बनाए तथा अपनी आँखें और कान खुले रखे|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
धार्मिक होना कोई जुर्म नहीं और नाही इसमें कुछ गलत है|धर्म सन्मार्ग पर चलने का,दृढ निश्चय का और यथार्थवादी होने का पर्याय है|दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ इतने धर्म हैं|यहाँ पर इतने धर्मों के बावजूद लोग सौहार्द और प्रेम से रहते हैं,हालांकि ये बात और है कि कई दंगे भी धर्म के नाम पर ही हुए हैं|राजनेता हों या अपने हित साधने वाले प्राणी,सब ही धर्म को अपना औजार बनाते हैं|इस औजार कि धार ही कुछ ऐसी है कि छूते ही काम समाप्त|धर्म के नाम पर आडम्बरों की भी कमी यहाँ नहीं है|कई लोगों के शुद्ध मुनाफे का जरिया भी धर्म है|इसी के सहारे कई लोग अपनी दुकान चलते हैं|
बात यहाँ किसी एक धर्म की नहीं है बल्कि कमोबेश हर एक का यही हाल है|रोड के किनारे इन्हें बनाने का तो चलन सा है|रोड चौड़ा होने का कोई चांस नहीं|रोड चौड़ा होगा तो वो मंदिर अथवा मस्जिद गिराया जाएगा परन्तु बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?अगर वो इमारत गरई जायेगी तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी|इसे मुद्दा बन जाने में तनिक भी विलंब नहीं होगा|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
धर्म का सहारा
धर्म का सहारा
धार्मिक होना कोई जुर्म नहीं और नाही इसमें कुछ गलत है|धर्म सन्मार्ग पर चलने का,दृढ निश्चय का और यथार्थवादी होने का पर्याय है|दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ इतने धर्म हैं|यहाँ पर इतने धर्मों के बावजूद लोग सौहार्द और प्रेम से रहते हैं,हालांकि ये बात और है कि कई दंगे भी धर्म के नाम पर ही हुए हैं|राजनेता हों या अपने हित साधने वाले प्राणी,सब ही धर्म को अपना औजार बनाते हैं|इस औजार कि धार ही कुछ ऐसी है कि छूते ही काम समाप्त|धर्म के नाम पर आडम्बरों की भी कमी यहाँ नहीं है|कई लोगों के शुद्ध मुनाफे का जरिया भी धर्म है|इसी के सहारे कई लोग अपनी दुकान चलते हैं|
कष्ट की बात तो तब होती है जब लोग धर्म के नाम पर वस्तुएं हथियाने पर आ जाते हैं|जगहों पर कब्ज़ा कर लिया जाता है और उसे अपने धनोपार्जन का पर्याय बना लिया जाता है|उदहारण के लिए शुरू में जहाँ पीपल का पेड़ होता है उसके आस पास दिये जलने शुरू होते हैं,फिर देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित होती हैं और इसके बाद वहां एक छोटा मंदिर खड़ा हो जाता है|इस प्रक्रिया के परवान चढ़ते चढ़ते एक दिन ऐसा आता है की वहां पर एक बड़ा मंदिर खड़ा हो जाता है जिस पर लिख दिया जाता है"प्राचीन पीपल महादेव मंदिर" या फिर प्राचीन महादेव मंदिर या फिर कुछ और नाम|इसके बाद पुजारी जी उसमे निवास करने लगते हैं जिस से उनके इतने बड़े शहर में निवास की समस्या समाप्त हो जाती है|ये निवास डी.डी.ए की तरह एकदम स्थायी होता है जिसे कोई माई का लाल हाथ नहीं लगा सकता|अगर कोई हाथ लगाएगा तो धर्म रुपी ब्रह्मास्त्र है न...
बात यहाँ किसी एक धर्म की नहीं है बल्कि कमोबेश हर एक का यही हाल है|रोड के किनारे इन्हें बनाने का तो चलन सा है|रोड चौड़ा होने का कोई चांस नहीं|रोड चौड़ा होगा तो वो मंदिर अथवा मस्जिद गिराया जाएगा परन्तु बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?अगर वो इमारत गरई जायेगी तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी|इसे मुद्दा बन जाने में तनिक भी विलंब नहीं होगा|
राजनीति एक दो-धारी तलवार है |पहले ये इन इमारतों के बन ने पर कोई विरोध नहीं जताती पर जब ये बन चुके होते हैं और इन्हें गिराया जाना ज़रूरी हो जाता है तब इनकी कुम्भकर्णी निद्रा टूटती है|अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने आदेश में इस बात को कहा है की रोड के किनारे धार्मिक इमारतों का निर्माण न करें|हमें इस ओर ध्यान देने की ज़रूरत है की हमें धार्मिक स्थलों को अपना और दूसरो का सरदर्द बन ने से बचें|इसके लिए सरकार लोगों को शिक्षित करे,युक्तिसंगत क़ानून बनाए तथा अपनी आँखें और कान खुले रखे|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
धार्मिक होना कोई जुर्म नहीं और नाही इसमें कुछ गलत है|धर्म सन्मार्ग पर चलने का,दृढ निश्चय का और यथार्थवादी होने का पर्याय है|दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ इतने धर्म हैं|यहाँ पर इतने धर्मों के बावजूद लोग सौहार्द और प्रेम से रहते हैं,हालांकि ये बात और है कि कई दंगे भी धर्म के नाम पर ही हुए हैं|राजनेता हों या अपने हित साधने वाले प्राणी,सब ही धर्म को अपना औजार बनाते हैं|इस औजार कि धार ही कुछ ऐसी है कि छूते ही काम समाप्त|धर्म के नाम पर आडम्बरों की भी कमी यहाँ नहीं है|कई लोगों के शुद्ध मुनाफे का जरिया भी धर्म है|इसी के सहारे कई लोग अपनी दुकान चलते हैं|
बात यहाँ किसी एक धर्म की नहीं है बल्कि कमोबेश हर एक का यही हाल है|रोड के किनारे इन्हें बनाने का तो चलन सा है|रोड चौड़ा होने का कोई चांस नहीं|रोड चौड़ा होगा तो वो मंदिर अथवा मस्जिद गिराया जाएगा परन्तु बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा कौन?अगर वो इमारत गरई जायेगी तो लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी|इसे मुद्दा बन जाने में तनिक भी विलंब नहीं होगा|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय|
मंगलवार, 29 सितंबर 2009
दिल्ली के तहजीब्दार लोग
"दिल्ली दिलवालों की नगरी है"|ये पंक्तियाँ शत प्रतिशत सही हैं|कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है जिस से आप सभी अवगत होंगे|सरकार द्वारा दिल खोल कर पैसा बहाया जाना इस बात का सबूत है की दिल्ली दिलवालों की है,अब काम किसी भी कारण से पूरा न हो सके तो इसके लिए बेचारी सरकार क्या करे | कभी लखनऊ के बाद तहजीब में दिल्ली का ही नम्बर आता था लेकिन अब गिरेबान में झांकें तो लगता है की सारा सलीका भूल गए हैं|फुटपाथ पर न चल के सड़क पर चलना हमारी आदतों में शुमार है,अगर मुंबई जाकर सड़क पर चलते हैं तो कांस्टेबल पूछ ही लेता है की आप दिल्ली से हैं क्या?
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगाते हैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लगना हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की घटनाएँ सबसे ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव पसार रही हैं| सफाई की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई सानी नही है|घर से बाहर कूड़ा ऐसे फ़ेंक देते हैं मानो ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो|दुकानवाले दुकान को भी अपनी दुकान का ही हिस्सा मानते हैं,भले ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी घिन न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
विदेशियों के साथ हुई घटनाएँ और बुरा बर्ताव हमारी संस्कृति को दिखाता है|ऑटो वाले उन्हें अपने ऑटो में ज़बरदस्ती बैठाने लगते हैं तो कई लोग उनके साथ बड़ी ही बुरी तरह से पेश आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी आमिर खान का सहारा लेकर विज्ञापन करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि देवो भव: के नारे लगाने की|बिजली की फिजूलखर्ची या पानी की बर्बादी भी हमें दिल्ली वाला साबित करती है|लेकिन अगर कोई कुछ कह दे तो भाई लोग ऐसा हंगामा करते हैं जैसे किसी ने झूठा आरोप मढ़ दिया हो|सिस्टम की खामियां जीवन को मुश्किल बनाती हैं पर क्या हमने अपनी लापरवाही से उन्हें और नही बढ़ा दिया है|हम हर बुरे के लिए सरकार को दोष देते हैं परन्तु क्या हमें अपने गिरेबान में नही झांकना चाहिए?हमें भी तो एक आदर्श स्थापित करने की ज़रूरत है|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय
"दिल्ली दिलवालों की नगरी है"|ये पंक्तियाँ शत प्रतिशत सही हैं|कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है जिस से आप सभी अवगत होंगे|सरकार द्वारा दिल खोल कर पैसा बहाया जाना इस बात का सबूत है की दिल्ली दिलवालों की है,अब काम किसी भी कारण से पूरा न हो सके तो इसके लिए बेचारी सरकार क्या करे | कभी लखनऊ के बाद तहजीब में दिल्ली का ही नम्बर आता था लेकिन अब गिरेबान में झांकें तो लगता है की सारा सलीका भूल गए हैं|फुटपाथ पर न चल के सड़क पर चलना हमारी आदतों में शुमार है,अगर मुंबई जाकर सड़क पर चलते हैं तो कांस्टेबल पूछ ही लेता है की आप दिल्ली से हैं क्या?
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगाते हैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लगना हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की घटनाएँ सबसे ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव पसार रही हैं| सफाई की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई सानी नही है|घर से बाहर कूड़ा ऐसे फ़ेंक देते हैं मानो ये हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो|दुकानवाले दुकान को भी अपनी दुकान का ही हिस्सा मानते हैं,भले ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी घिन न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
विदेशियों के साथ हुई घटनाएँ और बुरा बर्ताव हमारी संस्कृति को दिखाता है|ऑटो वाले उन्हें अपने ऑटो में ज़बरदस्ती बैठाने लगते हैं तो कई लोग उनके साथ बड़ी ही बुरी तरह से पेश आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी आमिर खान का सहारा लेकर विज्ञापन करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि देवो भव: के नारे लगाने की|बिजली की फिजूलखर्ची या पानी की बर्बादी भी हमें दिल्ली वाला साबित करती है|लेकिन अगर कोई कुछ कह दे तो भाई लोग ऐसा हंगामा करते हैं जैसे किसी ने झूठा आरोप मढ़ दिया हो|सिस्टम की खामियां जीवन को मुश्किल बनाती हैं पर क्या हमने अपनी लापरवाही से उन्हें और नही बढ़ा दिया है|हम हर बुरे के लिए सरकार को दोष देते हैं परन्तु क्या हमें अपने गिरेबान में नही झांकना चाहिए?हमें भी तो एक आदर्श स्थापित करने की ज़रूरत है|
अरुण सरोहा
हिंदी पत्रकारिता
दिल्ली विश्वविद्यालय
सोमवार, 28 सितंबर 2009
दिल्ली के tehzibdaar लोग
"दिल्ली दिलवालों की नगरी है"|ये पंक्तियाँ शत प्रतिशत सही हैं|कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन होने जा रहा है जिस से आप सभी अवगत होंगे|सरकार द्वारा दिल खोल कर पैसा बहाया जाना इस बात का सबूत है की दिल्ली दिलवालों की है,अब काम किसी भी कारण से पूरा न हो सके तो इसके लिए बेचारी सरकार क्या kare| कभी लखनऊ के बाद तहजीब में दिल्ली का ही नम्बर आता था लेकिन अब गिरेबान में झांकें तो लगता है की सारा सलीका भूल गए हैं|फुटपाथ पर न चलके सड़क पर चलना हमारी आदतों में शुमार है,अगर मुंबई जाकर सड़क पर चलते हैं तो कांस्टेबल पूछ ही लेता है की आप दिल्ली से हैं क्या?
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगातेहैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली
बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लग्न हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की ghatatnaye सबसे
ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव pasaar रही हैं|safayi की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई saani नही है|घर से बाहर kooda ऐसे phek देते हैं mano ये हमारा janmsiddh अधिकार हो|dukaanwale dukan को भी अपनी dukan का ही hissa mante हैं,bhale ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी ghinn न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
videshiyon के साथ हुई ghatnayen और बुरा bartaav हमारी sanskruti को dikhata है|auto वाले unhe अपने auto में zabardasti baithaane लगते हैं तो कई लोग unhe बड़ी ही buri तरह से pesh आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी aamir khan का sahara लेकर vigyapan करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि devo bhav के nare लगाने की|बिजली की fizoolkharchi या pani की barbadi भी hame दिल्ली wala sabit करती है|lekin अगर कोई कुछ keh दे तो भाई लोग ऐसा hungama करते हैं जैसे किसी ने झूठा aarop madh दिया हो|system की khamiyan जीवन को mushqil बनाती हैं पर क्या हमने अपनी laparwahi से unhe और नही बढ़ा दिया है|हम हर burai के लिए सरकार को dosh देते हैं परन्तु क्या hame अपने गिरेबान में नही jhaankna चाहिए?hame भी तो एक aadarsh sthapit करने की ज़रूरत है|
हम सब सड़क पर चलतें हैं लेकिन तब तक नियमों का पालन नही करते जब तक ट्रैफिक कांस्टेबल न दिख जाए|हेलमेट भी तभी लगातेहैं जब ट्रैफिक पुलिस का सिपाही दिखता है वरना क्यूँ खालीपिली
बाल ख़राब किए जायें?इसका इलाज भी ट्रैफिक वालों ने खोज लिया है- वे भी झाडियों के पीछे छिप कर खड़े होने लगे हैं|अब चाहकर भी कोई नज़र बचा कर नही निकल सकता|जेब्रा क्रॉसिंग की परवाह न करना,जहाँ पेशाब न करना हो वहीं पर करना,यहाँ वहां पान एवं गुटखे की पीक थूक देना,लेन में गाड़ी न चलाना खतरनाक तरीके से गाड़ी चलाना ,रेड सिग्नल जम्पकरना ,रौन्गसाइड चलना इत्यादि जितने भी सड़क पर चलने के नियम हैं हम उनकी बड़े गौरव के साथ धज्जियाँ उड़ते हैं|भूमिगत पैदल पार पथ के होते हुए भी सड़क गाड़ियों के बीच से भाग कर पार करना हमारी शान है|अगर ऐसा न हो तो हम दिल्ली वाले ही किस बात के?गाड़ी को कहीं भी पार्क कर देना तो हमारा जैसे अधिकार है|अगर नियमों को ठेंगा दिखलाते हुए पकडे जायें तो ऊँचे रसूख का रॉब देना हमारी आदत है|
दिल्ली की आबादी ढाई करोड़ के लगभग है|आपको ये जानकर ताज्जुब होगा की न्युजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुल आबादी मिला कर भी दिल्ली से कहीं कम है|धक्का मुक्की कर बसों में चढ़ना ,लाइन में न लग्न हमारे संस्कारों में आ चुका है|भगदड़ तो बचपन से ही शुरू हो जाती है स्कूल के समय से,जहाँ भगदड़ में ही स्टूडेंट्स को मौत का शिकार बन न पड़ता है|कई शोध भी ये बताने में नाकाम साबित हुए है की हम दिल्ली वाले लाइन में क्यूँ नही लगते?चाहे मदर डेयरी से दूध लेने की बात हो,ट्रेड फेयर को देखने के लिए लगी लाइन या फ़िर बस में चढ़ने का सवाल हो|दिल्ली के आंकडे बताते हैं की रोड रेज की ghatatnaye सबसे
ज़्यादा दिल्ली में ही अपने पाँव pasaar रही हैं|safayi की अगर बात करें तो हमारा वहां भी कोई saani नही है|घर से बाहर kooda ऐसे phek देते हैं mano ये हमारा janmsiddh अधिकार हो|dukaanwale dukan को भी अपनी dukan का ही hissa mante हैं,bhale ही वह पैदल चलने वालों के लिए हो|पान की पीक भी यहाँ वहां नज़र आने पे भी ghinn न होना भी बताता है की यह हमारी आदत बन चुकी है|
videshiyon के साथ हुई ghatnayen और बुरा bartaav हमारी sanskruti को dikhata है|auto वाले unhe अपने auto में zabardasti baithaane लगते हैं तो कई लोग unhe बड़ी ही buri तरह से pesh आते हैं,वरना सरकार को क्या ज़रूरत थी aamir khan का sahara लेकर vigyapan करने की|क्या ज़रूरत थी अतिथि devo bhav के nare लगाने की|बिजली की fizoolkharchi या pani की barbadi भी hame दिल्ली wala sabit करती है|lekin अगर कोई कुछ keh दे तो भाई लोग ऐसा hungama करते हैं जैसे किसी ने झूठा aarop madh दिया हो|system की khamiyan जीवन को mushqil बनाती हैं पर क्या हमने अपनी laparwahi से unhe और नही बढ़ा दिया है|हम हर burai के लिए सरकार को dosh देते हैं परन्तु क्या hame अपने गिरेबान में नही jhaankna चाहिए?hame भी तो एक aadarsh sthapit करने की ज़रूरत है|
मंगलवार, 22 सितंबर 2009
एच आर विभाग की कारस्तानी
आजकल चैनलों में मंदी का असर देखा जा सकता हैरोज़ खबरें आती हैं कि आज अमुक चैनल में छटनी हुई आज फलां में से लोगों को निकाला गया दरअसल मंदी कुछ है,और कुछ बताई एवं दिखाई जाती है मंदी के अचूक ब्रह्मास्त्र से चैनलों के एच -आर विभाग ने कई ऐसे लोगों को भी बाहर का रास्ता दिखला दिया जो किसी न किसी की आँख की किरकिरी बने हुए थे पत्रकार एक ऐसा व्यक्ति होता है जिसके पास समय का काफी अभाव होता हैवह दूसरी कंपनियों के कर्मचारियों से इस बात में भिन्न होता है कि उसका समय १० से ५ बजे तक नौकरी का नहीं होतापत्रकारों ने हमेशा से अपने ऊपर कॉरपोरेट जगत के क़ायदे-कानून लादे जाने का विरोध किया हैपत्रकारों ने कभी एच-आर के क़ायदे-कानूनों का पालन गर्मजोशी से नहीं कियाउन्होंने गुटखा खाकर उसकी पीक डस्टबिन में ही थूकी,चाय पीकर कप टेबल पर ही रखा और अगर सिगरेट पीने की इच्छा हुई तो या तो वहीं बैठे कश लगा लिया या न्यूजरूम से बाहर निकल औपचारिकता निभाते हुए टेंशन को धुएं में उड़ा दियाये सब बातें अपनी जगह हैं परन्तु इस तरह के लोगों ने अपने काम में कभी कोई कमी नहीं आने दीवे पूरी तरह अपने काम में लीन और समर्पित रहेइस तरह के लोग जो कायदों को ठेंगा दिखाते हों ,एच-आर उन्हें फायदे में कैसे रहने देते?आखिर "क़ायदे में ही फ़ायदा होता है"मंदी के नाम पर ऐसे लोगों को एच-आर विभाग ने ठिकाने लगा दियादरअसल एच-आर कर्मचारी खुद को सबसे उच्च कोटी का व्यक्ति समझता है वह सोचता है कि चैनल में सब काम तरीके से हों ,लोग हंसी-ठट्टा न करें ,चाय टेबल पर न पियें,हमेशा अपना आई -कार्ड रुपी पत्ता गले में डाले रहेंबात करते वक़्त प्रार्थना वाला लहज़ा हो ये सब बाकी कंपनियों में तो संभव है परन्तु चैनलों में नहींपत्रकारों के मध्य ये सब कोई मतलब नहीं रखते कई एच-आर बेहद कम जानकारी रखते हैं एवं साक्षात्कार के दौरान ऐसे पेश आते हैं मानो १००-१०० कोस तक इनके जैसा कोई नहीं हैमैंने जब इंटर्नशिप के लिए एक नामी चैनल में साक्षात्कार दिया तो चैनल की एच-आर हेड एक महिला थीं उन्होंने ऊलजुलूल प्रश्नों का जो सिलसिला शुरू किया तो मेरी स्थिति "काटो तो खून नहीं" वाली हो गयीउनका प्रशन था"आपने इतनी पढ़ाई क्यों की?"
मेरा उत्तर था-ज्यादा पढ़ना कोई बुरी बात तो नहीं ,अगर व्यक्ति अपनी शिक्षा में,शैक्षणिक योग्यता में वृद्धि करता रहे तो कोई बुरी बात है क्या?वैसे भी मुझे पढ़ाई का शौक़ हैदूसरा प्रश्न -आप अपनी एम.ए अलगप्पा विश्वविद्यालय से कर रहे हैं परन्तु ये तो कोई विश्वविद्यालय है ही नहींमेरा उत्तर-महोदया,अगर आप कहतीं कि मैंने इस विश्वविद्यालय का नाम नहीं सुना है तो बात कुछ और होती किन्तु आपने यह कह दिया है की इस नाम का कोई विश्वविद्यालय है ही नहींआपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह विश्वविद्यालय १९८५ में तमिलनाडु विधानसभा के एक्ट से बना विश्वविद्यालय है जो NAAC द्वारा "A" ग्रेड में आँका गया हैयह विश्वविद्यालय AIU का सदस्य है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यताप्राप्त हैयह दूर शिक्षा परिषद् से भी मानित है जहाँ तक दूरस्थ शिक्षण प्रणाली का सवाल है एक एच-आर हेड कि ऐसी जानकारी होना मुझे बहुत अजीब लगावो महिला इतने ऊंचे पद पर आसीन है वो भी एक न्यूज़ चैनल के ,फिर भी ऐसी जानकारी?ये वाकई उस चैनल का दुर्भाग्य ही कहा जाएगाकई एच-आर पत्रकारों के ऑफिस आने का टाइम भी नोट करते हैं,अब इनको कौन समझाए कि पत्रकारों के कार्यालय आने-जाने का कोई समय नहीं होताये ख़बर को फालो करते हैं और शिफ्ट का समय ओवर हो जाने पर भी काम करते रहते हैंएच-आर कर्मचारियों को ये समझना चाहिए की जिस दबाव में पत्रकार काम करता है वह है क्याकभी उनके जाने का समय भी नोट किया कीजियेएक महिला न्यज़ चैनल में नयी नयी एच-आर बनीं थीं तो आते ही उन्होंने डंडा चलाना शुरू कर दियायहाँ टेबल पर कप क्यों रखा है,आई-कार्ड गले में क्यूँ नहीं डाला हुआ है,गुटखा काम करते वक़्त क्यूँ खाते हो इत्यादि-इत्यादिसारे पत्रकार परेशान एक दिन उस महिला कि बहस सीनियर प्रोड्यूसर से हो गयी,देखते ही देखते मामले गर्म हो गया और बात इस्तीफे तक आ गयीअब वो प्रोड्यूसर कोई छोटी मोती हस्ती तो थे नहींउन्होंने अपना इस्तीफा मेल से भेज दियाजब उच्च प्रबंधन तक बात पहुंची तो उस एच-आर हेड कि क्लास ली गयी और किसी तरह प्रोड्यूसर साहब को मनाया गयाऐसे एक नहीं अनेक मामले देखने को मिलते हैंकई भाई लोग तो पान -गुटखा खाए बगैर काम नहीं कर सकते कईयों को ३-४ बार चाय पीने कि आदत हैअगर गुटखा न खाएं या सिगरेट के कश न लगायें तो क्या मजाल कि ख़बरें लिख दी जाएं या बुलेटिन में नयी ख़बरें डाली जाएं
लेकिन एच-आर वाले लोगों को ये बातें कहाँ समझ आती हैं?वह तो मंदी कि आड़ में ऐसे लोगों को निकाल रहे हैं जिनसे उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी है या जो पहले से ही चाटुकारिता के आदर्श से परे कई लोगों कि आँख कि किरकिरी बने हुए हैं
मेरा उत्तर था-ज्यादा पढ़ना कोई बुरी बात तो नहीं ,अगर व्यक्ति अपनी शिक्षा में,शैक्षणिक योग्यता में वृद्धि करता रहे तो कोई बुरी बात है क्या?वैसे भी मुझे पढ़ाई का शौक़ हैदूसरा प्रश्न -आप अपनी एम.ए अलगप्पा विश्वविद्यालय से कर रहे हैं परन्तु ये तो कोई विश्वविद्यालय है ही नहींमेरा उत्तर-महोदया,अगर आप कहतीं कि मैंने इस विश्वविद्यालय का नाम नहीं सुना है तो बात कुछ और होती किन्तु आपने यह कह दिया है की इस नाम का कोई विश्वविद्यालय है ही नहींआपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यह विश्वविद्यालय १९८५ में तमिलनाडु विधानसभा के एक्ट से बना विश्वविद्यालय है जो NAAC द्वारा "A" ग्रेड में आँका गया हैयह विश्वविद्यालय AIU का सदस्य है और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यताप्राप्त हैयह दूर शिक्षा परिषद् से भी मानित है जहाँ तक दूरस्थ शिक्षण प्रणाली का सवाल है एक एच-आर हेड कि ऐसी जानकारी होना मुझे बहुत अजीब लगावो महिला इतने ऊंचे पद पर आसीन है वो भी एक न्यूज़ चैनल के ,फिर भी ऐसी जानकारी?ये वाकई उस चैनल का दुर्भाग्य ही कहा जाएगाकई एच-आर पत्रकारों के ऑफिस आने का टाइम भी नोट करते हैं,अब इनको कौन समझाए कि पत्रकारों के कार्यालय आने-जाने का कोई समय नहीं होताये ख़बर को फालो करते हैं और शिफ्ट का समय ओवर हो जाने पर भी काम करते रहते हैंएच-आर कर्मचारियों को ये समझना चाहिए की जिस दबाव में पत्रकार काम करता है वह है क्याकभी उनके जाने का समय भी नोट किया कीजियेएक महिला न्यज़ चैनल में नयी नयी एच-आर बनीं थीं तो आते ही उन्होंने डंडा चलाना शुरू कर दियायहाँ टेबल पर कप क्यों रखा है,आई-कार्ड गले में क्यूँ नहीं डाला हुआ है,गुटखा काम करते वक़्त क्यूँ खाते हो इत्यादि-इत्यादिसारे पत्रकार परेशान एक दिन उस महिला कि बहस सीनियर प्रोड्यूसर से हो गयी,देखते ही देखते मामले गर्म हो गया और बात इस्तीफे तक आ गयीअब वो प्रोड्यूसर कोई छोटी मोती हस्ती तो थे नहींउन्होंने अपना इस्तीफा मेल से भेज दियाजब उच्च प्रबंधन तक बात पहुंची तो उस एच-आर हेड कि क्लास ली गयी और किसी तरह प्रोड्यूसर साहब को मनाया गयाऐसे एक नहीं अनेक मामले देखने को मिलते हैंकई भाई लोग तो पान -गुटखा खाए बगैर काम नहीं कर सकते कईयों को ३-४ बार चाय पीने कि आदत हैअगर गुटखा न खाएं या सिगरेट के कश न लगायें तो क्या मजाल कि ख़बरें लिख दी जाएं या बुलेटिन में नयी ख़बरें डाली जाएं
लेकिन एच-आर वाले लोगों को ये बातें कहाँ समझ आती हैं?वह तो मंदी कि आड़ में ऐसे लोगों को निकाल रहे हैं जिनसे उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी है या जो पहले से ही चाटुकारिता के आदर्श से परे कई लोगों कि आँख कि किरकिरी बने हुए हैं
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